स्व-प्रतिरक्षित विकार- कैसे की जाती है जाँच और पहचान?

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15th March, 2018

प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े विकार, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा निर्मित एंटीबॉडीज़, जिनका निर्माण शरीर में घुसे हानिकारक तत्वों को खत्म करने के लिए किया जाता है, जब यही एंटीबॉडीज़ शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर आक्रमण कर उन्हें बीमार करना शुरू कर देती हैं, तो इसे स्व-प्रतिरक्षित विकार कहा जाता है।

हालाँकि शुरुआत में इसके लक्षण हल्के होते हैं और इसके कारण पनपी हर एक बिमारी के लक्षण अलग-अलग होते हैं, इसलिए इन्हें महज लक्षणों के आधार पर स्व-प्रतिरक्षित प्रणाली विकार ही घोषित नहीं किया जा सकता और जाँच के बाद ही यह सुनिश्चित हो पाता है कि यह समस्या प्रतिरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी से जुड़ी हुई है। साथ ही जब व्यक्ति इसके लक्षणों को लेकर डॉक्टर के पास जाता है, तो महज एक जाँच के द्वारा डॉक्टर भी यह पता नहीं लगा पाते कि यह ऑटोइम्यून डिज़ीज है।

ऑटोइम्यून डिजीज की जाँच के तरीके-

शारीरिक जाँच- डॉक्टर कोई भी जाँच शुरू करने से पहले बिमारी के लक्षणों से अंदाजा लगाते हैं कि यह कौन सी बीमारी होती है और इसके लिए मरीज से उसके स्वास्थ्य, लक्षणों और परेशानियों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं।

एंटीनीकुलर एंटीबॉडी टेस्ट (एएनए)- प्राथमिक शारीरिक जाँच के बाद ऑटोइम्यून डिजीज के लिए सबसे पहले एनए जाँच करते हैं। यह एक रक्त जांच होती है। जाँच में, शरीर में उन एंटीबॉडीज़ (ऑटो-एंटीबॉडीज़) की जाँच की जाती है, जो स्वस्थ कोशिकाओं पर आक्रमण करती है। इस जाँच के नतीजे शरीर में ऑटो-एंटीबॉडीज की कम या अधिक मात्रा के रूप में सामने आ सकते हैं। यदि शरीर में कोशिकाओं पर आक्रमण करने वाली एंटीबॉडीज की संख्या बढ़ी है, मतलब जाँच के नतीजे पोजेटिव हैं और यदि कम है, मतलब ऑटोइम्यून डिसऑर्डर होने की संभावना कम है। भले ही जाँच के नतीजे नकारात्मक हो या सकारात्मक डॉक्टर दोनों ही स्थितियों में, रोगी की अन्य जाँचें करते हैं।

इन्फ्लेमेशन एंड ऑर्गन फंक्शन टेस्ट- एनए जाँच के बाद डॉक्टर रोगी की यह जाँच करते हैं। इसमें पता लगाया जाता है कि शरीर के सभी अंग सही से काम कर रहें हैं या नहीं। कहीं ऑटो-एंटीबॉडीज से उन्हें कोई नुकसान तो नहीं पहुँचा है। इसमें गुर्दो, फेंफड़ो, लिवर, आंतों की जाँच की जाती है। जाँच में देखा जाता है कहीं किसी अंग पर सूजन तो नहीं है।

वहीं यदि दोनों ही परिस्थितियों में जाँच के नतीजे सामान्य आते हैं, लेकिन आपमें लक्षण अभी भी मौजूद हैं, साथ ही आपके परिवार में पहले से भी किसी को ऑटो इम्यून विकार है, तो इस स्थिति में आपके लिए बेहद आवश्यक होता है कि अपने डॉक्टर के साथ लगातार संपर्क में रहें। थोड़े-थोड़े समय अंतराल पर अपनी जाँचें कराते रहें। साथ ही उन कारकों से दूर रहें जो इस बीमारी को ट्रिगर करने में ज़िम्मेदारी अदा करते हैं।

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