छोटी माता या चेचक

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5th October, 2016

Choti mata ke lakshan kya hain? | छोटी माता के लक्षण क्या हैं? | What are the symptoms of Choti mata ya Chechak?छोटी माता या चेचक (चिकेन पॉक्स) एक ऐसा संक्रमण है, जो वेरीसेल्ला जोस्टर वायरस के कारण फैलता है। भारत में इसे एक दैवीय समस्या समझा जाता है और इसका इलाज भी झाड़-फूंक से ही किया जाता है। वैसे तो यह बिमारी किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो जाती है, लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे इसके शिकार ज्यादा होते हैं। यह ऐसी बिमारी है, जो एक व्यक्ति से दूसरे को बेहद आसानी से लग जाती है।

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छोटी माता के लक्षण

किसी व्यक्ति को यह संक्रमण, किसी संक्रमित रोगी के संपर्क में आने के बाद 14 से 16 दिनों में प्रभावित करता है। किसी व्यक्ति के शरीर में एक बार वायरस घुसने के बाद इसके लक्षण दो से तीन दिनों में नज़र आने लगते हैं।

इस बिमारी की शुरुआत, शरीर पर छोटे-छोटे दानों से होती है, जो लाल रंग के होते हैं। यह दाने सबसे पहले गले और छाती पर होते हैं और इसके बाद, चेहरे पेट और पूरे शरीर पर फ़ैल जाते हैं। यह दाने देखने में थोड़े बहुत घमौरियों के जैसे लगते हैं, लेकिन इनमें दानों के ऊपर सफ़ेद रंग की पानी की छोटी-छोटी थैलियां सी बन जाती हैं। ज्यादातर शुरुआत में, इसका पता नहीं चल पाता, लेकिन नहाते वक्त इन पर पानी या साबुन लगने से खुजली या जलन होने लगती है।

धीरे-धीरे यह लाल चकते पूरे शरीर पर लाल रंग के दानों के रूप में फैल जाते हैं।  शरीर पर दानों के दिखने के बाद व्यक्ति को बुखार की शुरुआत होती है। धीरे-धीरे रोगी को बुखार, शरीर में दर्द, और चुभन, सिर में दर्द और भूख लगना बंद हो जाता है।

छोटी माता, ज्यादातर हल्की होती है और बड़ी माता के जितनी परेशानी कारक नहीं होती। यह माता, बड़ी माता से जल्दी ठीक भी हो जाती है। छोटी माता, ज्यादातर महज 5 से 10 दिनों के भीतर ठीक हो जाती है।

इस बिमारी से बच्चों को बचाने के लिए चिकित्सा जगत ने अब टिके भी तैयार कर लिए हैं, ताकि इस बिमारी को होने से रोक जा सके। यह टिके उन बच्चों को, जो 12 महीने के हो चुके हों, और जिन्हें अभी तक यह बिमारी न हुई हो लगाए जा सकते हैं। साथ ही मजबूत रोग प्रति रोधक क्षमता वाले बच्चे भी इस बिमारी से जल्दी ग्रसित नहीं होते। लेकिन जिन बच्चों की रोग प्रति रोधक क्षमता कमजोर हो, या वह बहुत छोटे हों, जिनके घर में यह बिमारी कुछ ही दिनों पहले किसी को हुई हो, उन्हें यह संक्रमण आसानी से प्रभावित कर सकता है।

एक और महत्वपूर्ण बात कि क्योंकि इस बिमारी के वायरस पर दवाई का असर नहीं होता, और सिर्फ खान-पान और अच्छी देख-रेख में इस बिमारी के खत्म होने का इंतजार किया जाता है, यह बिमारी दैवीय आपदा के नाम से प्रचलित हो चुकी है। ऐसे में, देश के गाँवों और दूर-दराज वाले इलाकों में इसके लिए किसी भी तरह की कोई दवाई प्रयोग नहीं की जाती।

ऐसे में, भले ही इसके लिए कोई दवाई उपलब्ध न हो, लेकिन शरीर पर लगाए जाने वाले लोशन से इस बिमारी में त्वचा पर होने वाले चकतों में आराम मिल जाता है। इस बिमारी की एक और खास बात यह है कि यह बिमारी एक बार होने के बाद, किसी को दोबारा नहीं होती, लेकिन यदि बिमारी के विषाणु शरीर में रह जाएं तो वह भविष्य में शरीर पर चकतों के रूप में फिर से उभर सकते हैं।

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