अग्नाश्य न बदला जाए तो पूरे शरीर को खराब कर सकती है डायबिटीज

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26th October, 2015

ashya Pratyaropan Surgery | अग्नाशय प्रत्यारोपण सर्जरी | Pancreas Transplant Surgeryअग्नाशय प्रत्यारोपण में रोगी के निष्क्रिय या कम सक्रीय अग्नाश्य के स्थान पर किसी डोनर (दाता) से लिए गए अग्नाश्य को लगा दिया जाता है। आम तौर पर, अग्नाशय की समस्या, इतनी गंभीर नहीं होती, यदि किसी व्यक्ति को डायबिटीज न हो तो। डायबिटीज यानी मधुमेह इस समस्या को और भी ज्यादा घातक बना देता है। यहाँ तक कि इसे बदलने तक की नौबत आ जाती है।

अग्नाश्य प्रत्यारोपण की नौबत ज्यादातर टाइप 1 डायबिटीज में ही आती है। ऐसा इसलिए क्योंकि टाइप 1 डायबिटीज के कारण अग्नाश्य शरीर में रक्त शर्करा को नियंत्रित करने वाले इन्सुलिन का निर्माण नहीं कर पाता और नतीजा रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ने के रूप में सामने आता है। जब अग्नाश्य द्वारा इन्सुलिन का बनाया जाना बिलकुल बन्द हो जाता है तो रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ता चला जाता है और इससे डायबिटीज की स्थिति और ज्यादा गंभीर होती चली जाती है। इसका सीधा असर शरीर के बाकी हिस्सों पर भी बहुत ज्यादा नकारात्मक पड़ता है।

शरीर को इसी घातक क्षति से बचाने के लिए अग्नाश्य प्रत्यारोपण का निर्णय लिया जाता है।

डायबिटीज के मरीजों में कब जरूरी हो जाता है अग्नाश्य प्रत्यारोपण?

डायबिटीज के मरीजों में, खास तौर टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों में, अग्नाश्य प्रत्यारोपण उस वक्त जरुरी हो जाता है, जब शरीर में इन्सुलिन बिलकुल न बन पाने के करण, शरीर में एकत्रित शर्करा शरीर के अन्य अंगों को घातक क्षति पहुंचाना शुरू कर देती है।

डायबिटीज की वह स्थितियां जिसमें जरुरी हो जाता है अग्नाश्य प्रत्यारोपण-

  • टाइप 1 मधुमेह, जिसे मेडिकल ट्रीटमेंट के बाद भी नियंत्रित न किया जा सके,
  • यदि किसी व्यक्ति को दिए जा रहे इंसुलिन से प्रतिक्रियाएं हो रही हों,
  • यदि व्यक्ति के शरीर में रक्त शर्करा का स्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा हो,
  • यदि रोकी के गुर्दे भी खराब होने लगे हों,
  • यदि व्यकि की आँखों पर भी शर्करा का नकारात्म असर दिखें लगा हो
  • यदि व्यक्ति में हृदय रोग होने की आशंका बढ़ती जा रही हो।

इस तरह की स्थितियों में रोगी के लिए अग्नाश्य प्रत्यारोपण कराना बहुत जरूरी हो जाता है, नहीं तो यह रक्त शर्करा और इसके लिए लिया जा रहा ट्रीटमेंट उसके शरीर को पूरी तरह से ग्रस्त बना सकते हैं। यहाँ तक कि रोगी की जान भी जा सकती है।



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