बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज

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5th April, 2016

1कुछ सालों पहले तक टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों की संख्या मुश्किल ही देखने में आती थी। यहाँ तक कि डॉक्टरों का भी यही मानना था कि बच्चो को सिर्फ टाइप 1 डायबिटीज ही होती है। इसलिए इसे काफी दिनों तक जुवेनाइल डायबिटीज (किशोरों में होने वाली डायबिटीज) के नाम से ही जाना जाता था।

लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योकि CDC के अनुसार, 208,000 से ज्यादा लोग जिनकी उम्र 20 साल से कम है, उनमें टाइप 2 प्रकार की डायबिटीज पायी गयी है।

क्या होती है टाइप 2 डायबिटीज?

हम कई बार डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर का ज़िक्र कर चुके हैं। जिसमें हमारा पाचन तंत्र, कार्बोहाइड्रेट्स को एक प्रकार के, शुगर के रूप में तोड़ता है जिसे ग्लूकोस कहते है। अग्न्याशय एक प्रकार के हॉर्मोन का निर्माण करता है जिसे इन्सुलिन कहते है, जो ग्लूकोस को रक्त के माध्यम से कोशिकाओं तक पहुँचने में मदद करता है। जिसे वह इंधन या ऊर्जा के रूप में प्रयोग करता है।

टाइप 2 मधुमेह में, बच्चों में भी उसी तरह से शरीर में कोशिकायें इंसुलिन के लिए कोई प्रतिक्रिया देनी बंद कर देती है जिस तरह से बड़ों में होती है। इसके कारण ग्लूकोस का स्तर रक्त में बढ़ने लगता है। इसे इंसुलिन प्रतिरोध कहा जाता है। बच्चें के शरीर में जब यह ग्लूकोस का स्टार बहुत बढ़ जाता है तो उसे नियंत्रित करना बच्चे के वश के बाहर हो जाता है। यदि इस स्थिति को समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो यह भविष्य में उसे हृदय रोग, अंधापन, और गुर्दे की विफलता जैसी समस्याओं का शिकार भी बना सकता है।

टाइप 2 मधुमेह होने की संभावना किसमें होती है ज्यादा?

  • लड़कियों में।
  • अधिक वजन वाले बच्चों में।
  • मधुमेह के इतिहास वाले, परिवार के बच्चों में।
  • इंसुलिन प्रतिरोध वाले व्यक्तियों में।

बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज का सबसे प्रमुख कारण वजन का अधिक होना है। अगर आपके बच्चें का वजन बहुत ज्यादा है तो, उसे डायबिटीज होने की संभावना दौगुनी हो जाती है।

बच्चों में मोटापे और वजन बढ़ने का कारण :

  • ऐसा भोजन करना, जो स्वास्थ के लिए हानिकारक हो।
  • शारीरिक श्रम का अभाव।
  • परिवार का सदस्य (जीवित या मृत) जिसका वजन अधिक हो रहा हो।
  • कम ही सही लेकिन, हार्मोन समस्या या अन्य चिकित्सीय अवस्था।

वयस्कों के समान ही बच्चों में भी, अगर पेट के पास ज्यादा फैट हो तो, उसे टाइप 2 प्रकार की डायबिटीज होने की संभावना ज्यादा होती है।

टाइप 2 मधुमेह के लक्षण?

शुरुआत में, टाइप 2 मधुमेह के लक्षण नज़र नहीं आते है। लेकिन कुछ समय के बाद, आप कुछ इस तरह के लक्षण सामने आते हैं:

  • बिना वजह अचानक से वजन कम होना।
  • भूख लगना या बहुत प्यास लगना, यहां तक कि खाने के बाद भी।
  • मुँह का खुश्क रहना।
  • बहुत ज्यादा यूरिन पास होना।
  • थकावट।
  • नेत्र की ज्योति कम होना।
  • साँस लेने में तकलीफ।
  • घावों का देर से भरना।
  • शरीर में निरन्तर खुजली रहना।
  • हाथ या पैर का सुन्न या झुनझुनाहट होना।

अगर आपको अपनें बच्चें में, इनमें से कोई भी लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

कैसे किया जाता है टाइप 2 डायबिटीज इलाज?

यदि आपको अपने बच्चे में अचानक से वजन कम होने की समस्या नजर आए तो इसके लिए डॉक्टर से संपर्क करें। डॉक्टर बच्चें की उम्र, उचाईं, और वजन की तुलना करके उसमें किसी समस्या के होने या न होने का पता लगाएगा। साथ ही डॉक्टर यह भी सुनिश्चित कर लेगा कि उसे डायबिटीज है या प्रीडायबिटीज है।

इसके लिए बच्चे के रक्त की जाँच आर कुछ अन्य जाँच परीक्षण भी किये जाएंगे। इस जाँच में बच्चे के डायबिटीज टाइप 2, टाइप 1, और प्री-डायबिटीज किसी के होने की भी पुष्टि हो सकती है।

यदि बच्चे को इन जांचों में डायबिटीज होने की पुष्टि होती है तो डॉक्टर इन्सुलिन देने की शुरुआत कर सकता है। वहीं यह सुनिश्चित होने पर कि बच्चे को टाइप 2 डायबिटीज है, वह उसकी जीवन शैली में कुछ बदलावों की सलाह भी दे सकता है। बच्चे को मेटफॉर्मिन नामक दवाई देने का भी सुझाव दे सकता है। केवल यही दो दवाएं हैं जिनकी 18 साल से कम उम्र के आयु के बच्चों को दिए जाने की मंजूरी है। इनसे अलग दवाओं पर अभी शोध शोध चल रही है।

इसके अलावा आपके बच्चें का हर तीसरे महीनें में, हीमोग्लोबिन A1c नामक परिक्षण भी किया जाता है। इस टेस्ट में एक निश्चित समय अंतराल के बाद उसके रक्त में शर्करा के औसत स्तर की माप की जाती है।

कब जरुरी है रक्त शर्करा के स्तर की जाँच?

  • जब उपचार शुरू हो या उसमें कोई परिवर्तन किया जाए।
  • जब उपचार का उदेश्य पूरा ना हो पा रहा हो।
  • अगर उसे इन्सुलिन दिया जा रहा है।
  • अगर उसे सुल्फोनीलयूरिया ( Sulfonylurea) ड्रग दिया जा रहा हो।

डॉक्टर आपको ब्लड शुगर जाँच का तरीका घर पर ही करने के लिए बता देगा। जिस से आप खुद भी घर पर रहकर अपने बच्चे के ब्लड शुगर की जाँच कर सकते हैं। साथ ही यह भी जरुरी है कि आपको यह भी पता हो कि यह जाँच कब और कितनी बार करनी है। खासकर यदि आपके बच्चे को इन्सुलिन दिया जा रहा है तो। बहुत से स्वास्थ विशेषज्ञ दिन में तीन या उससे अधिक बार जाँच करने का सुझाव देते हैं। लेकिन अगर आपके बच्चे को इन्सुलिन नहीं दिया जा रहा है तो जाँच ज्यादा बार नहीं करनी पड़ती। एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी है कि खाना खाने के बाद जरुर करनी है। इस जाँच के लिए इसके लिए फिंगर स्टीक टेस्ट या कॉन्टिनोउस ग्लूकोज मॉनिटर सिस्टम का उपयोग किया जाता है।

इसके अलावा यदि आपके बच्चे में डायबिटीज की पुष्टि हो गई है, तो यह भी जरूरी है कि आप उसके लिए एक स्वास्थ्य आहार की सूची बनाएं। इसके लिए आप किसी आहार विशेषज्ञ से भी मिल सकते हैं। इसके अलावा बच्चे को रोज कम से कम 60 मिनट रोज व्यायाम करवाएं। हर 2 घंटे के अंदर, घर पर ही आप अपने बच्चे की जाँच करते रहें।

कैसे पाएं बच्चों में डायबिटीज पर नियंत्रण

टाइप 2 डायबिटीज के इलाज के लिए जो प्रक्रिया बड़ों में अपनाई जाती है, बच्चों में भी उसी के द्वारा उपचार किया जाता है। ध्यान रखें कि बच्चा खाने में ज्यादा मीठा और चिकनाई न ले रहा हो। साथ ही इस बात को भी निश्चित कर लें कि वह रोज शारीरिक तौर पर एक्टिव रहे। अध्ययनों में यह पाया गया है कि व्यायाम, इंसुलिन प्रतिरोध पर जादुई तरीके से कार्य करता है। इसीलिए खान-पान पर नियंत्रण और व्यायाम द्वारा आप अपने बच्चे में मधुमेह को नियंत्रित रख सकते हैं।

कुछ खास जिम्मेदारियां

बच्चे, खासकर जिनकी उम्र बहुत कम हो, उनमें टाइप 2 डायबिटीज पर नियंत्रण पाना बहुत मुश्किल होता है।

यहाँ कुछ ऐसे टिप्स दिए गए है जिनके द्वारा इस स्थिति में आपको काफी मदद मिल सकती है:

  • आप अपने बच्चों से उसके स्वास्थ्य और वजन के बारे में ईमानदारी से बात करें। उनकी सहायता करें। उन्हें प्रोत्साहित करें ताकि वह आपसे खुल कर अपनी चिंताओं के बारे में बात कर सकें।
  • उन्हें दूसरे बच्चो से अलग न रखें। उनके साथ विशेष तरह का व्यवहार ना करें। उसके लिए अलग से खाना तैयार न करें बल्कि आपके पूरे परिवार के लिए भी वह खाना स्वास्थ्य वर्धक है। इसीलिए इस तरह से खाना तैयार करें कि वह आपसे अलग-थलग महसूस न करे। बदलाव धीरे-धीरे लाएं। जिस तरह से डायबिटीज के विकसित होने में समय लगता है, वैसे ही इसे ठीक होने में भी समय लगेगा।
  • जिन गतिविधियों से आपके बच्चों को ख़ुशी मिलती है उसमें खुद भी आनंद लें। खुद भी TV देखना और ऐसी चीजें जिसमें बैठे रहना पड़ता हो कम कर दें और अपने बच्चें के साथ शारीरिक गतिविधियों में शामिल हों।
  • अगर बच्चा कुछ चीजों का पालन करने से मना करे तो उस पर गुस्सा न हो बल्कि उस कारण को जानने का प्रयास करें जिस से वह ऐसा कर रहा है। उदाहरण के लिए, किशोरावस्था में जब शरीर में हार्मोन में बदलाव होते हैं तो अक्सर बच्चे दोस्तों के साथ मिलकर ऐसी चीजों की तरफ आकर्षित हो जाते हैं जो उनकी सेहत के लिए अच्छा नही होता। साथ ही बच्चे भी इस बात को नहीं समझ पाते।
  • ऐसे लक्ष्य बनाएं जो छोटे हों और आसानी से पूरे भी हो जाएं। जब आपका बच्चा अपना लक्ष्य पूरा कर ले, तो इसके लिए उसकी तारीफ़ करें उसे कोई इनाम दें, और फिर उसे अगला लक्ष्य सौंप दें।
  • बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर कोई लापरवाही न हो, इसलिए लगातार डायबिटीज शिक्षक, डॉक्टर, आहार विशेषज्ञ, या अन्य मधुमेह विशेषज्ञों से संपर्क में रहें।

यदि आप अपने बच्चे के लिए मधुमेह स्वास्थ्य देखभाल टीम के साथ मिलकर काम करेंगे तो यकीनन, आने वाले वर्षों में आपका बच्चा स्वस्थ हो जाएगा।



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