नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस क्या है?

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15th April, 2016

Nephrogenic Insipidus ke Lakshan, Kaaran aur Upchaar | नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस के लक्षण, कारण और उपचार | Nephrogenic Diabetes Insipidus Causes, Symptoms and Treatment नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस, एक दुर्लभ विकार है जो सामान्य रूप से नहीं पायी जाती है। यह डायबिटीज मेलिटस जैसे बिल्कुल नहीं है। डायबिटीज मेलिटस का कारण उच्च रक्त शर्करा होता है, लेकिन नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस, का मुख्य कारण किडनी मेँ खराबी है।

इस रोग से पीड़ित लोगोँ मेँ उनकी किडनी हार्मोन के लिए सही से प्रतिक्रिया नहीँ देती है। जिस कारण उनके शरीर मेँ तरल पदार्थोँ का सही संतुलन नहीँ होता है। इस रोग से पीड़ित लोगोँ को बहुत प्यास लगती है और बार- बार यूरिन पास करने जाना पड़ता है। इस रोग का इलाज, बहुत ही चुनौतीपूर्ण होता है।

क्या है नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस?

डायबिटीज इन्सिपिडस का मुख्य कारण डाइयूरेटिक नामक हार्मोन (ADH) मेँ खराबी है। यह हमारे दिमाग के हायपोथैलमस (Hypothalamus) नामक भाग मेँ बनता है और पिट्यूटरी ग्रंथि में संग्रहित होता है। यह हार्मोन इस चीज को नियंत्रित करता है कि हमारे शरीर से कितना पानी यूरिन के माध्यम से बाहर निकलेगा और किस कंसंट्रेशन मेँ निकलेगा।

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस में, पर्याप्त मात्रा में ADH का उत्पादन होता है, लेकिन किडनी इसके लिए कोई प्रतिक्रिया नहीँ देती है। इसका मुख्य कारण यह भी हो सकता है कि किडनी मेँ ADH सेंसर उपस्थित ना हो या क्षतिग्रस्त हो गए हों। इसका यह नतीजा होता है कि ADH बिना कोई प्रभाव डाले शरीर में बहता रहता है और इस कारण किडनी सही मात्रा मेँ पानी को अवशोषित नहीँ करता है। यदि ADH उपस्थित नहीं होगा तो यूरिन प्रचुर मात्रा में बाहर निकलने लगेगा।

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस के लक्षण

जब किडनी में पानी अवशोषित करने की क्षमता खत्म हो जाती है तो यह नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस के लक्षण को जन्म देता है। इस बीमारी के लक्षण निन्न प्रकार हैँ-

  • अधिक प्यास लगना
  • अत्यधिक मूत्र उत्पादन (Polyuria)

कुछ लोगों में, जब इनके लक्षण बहुत गंभीर हो जाते हैँ, तो उनके शरीर मेँ पानी की अत्यधिक कमी हो जाती है। अत्यधिक तरल पदार्थ के नुकसान से इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन के लक्षण निन्न प्रकार है –

  • अत्यधिक कमजोरी होना
  • सुस्ती
  • मांसपेशियों में दर्द
  • चिड़चिड़ापन

ऐसे लोग जिन्हे बहुत प्यास लगती है, उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति रोजाना पुरे दिनभर में, हर 15 मिनट मेँ एक बड़ा ग्लास पानी पीता हो और उतनी ही बार यूरिन पास करता हो। क्योंकि किडनी इतना पानी इकट्ठा करके नहीँ रख सकता, तो ऐसे लोगोँ मेँ इस बीमारी का पता लगाना बहुत मुश्किल है क्योंकि इस बीमारी का मुख्य लक्षण बहुत ज्यादा प्यास लगना ही है।

इस बीमारी को इन्सिपिडस क्योँ कहा जाता है?

इन्सिपिडस का मतलब होता है- फीका। इस बीमारी से पीड़ित लोगोँ का यूरिन फीका होता है मतलब रंगहीन और स्वादहीन। आप माने या माने लेकिन बहुत पहले डॉक्टर इस बीमारी का पता लगाने के लिए यूरिन को चख कर देखते थे। इसके विपरीत डायबिटीज मेलेटिस में यूरिन स्वाद मेँ मीठा होता है। लेकिन डायबिटीज इन्सिपिडस से पीडित लोगोँ मेँ यूरिन रंगहीन और स्वादहीन होता है।

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस के कारण

बच्चों मेँ यह बीमारी मुख्यत: विरासत मेँ मिलेँ जेनेटिक म्युटेशन के कारण होता है, जो इनमेँ जन्म से ही उपस्थित होते हैँ। इसका यह परिणाम होता है कि ADH के रिसेप्टर सही से काम नहीँ करते हैँ।

वयस्कोँ मेँ इस बीमारी का मुख्य कारण जेनेटिक म्युटेशन नहीँ होता है लेकिन कुछ दवाइयों और इलेक्ट्रोलाइट में असामान्यताओं के कारण यह बीमारी विकसित हो सकती है। वयस्कोँ मेँ इस बीमारी का मुख्य कारण निन्नलिखित हैँ :

  • लिथियम एक प्रकार की दवा होती है जिसे बाइपोलर नामक बिमारी से पीड़ित लोगोँ को दिया जाता है। 20% लोग जो लिथियम लेते हैँ उनमें अक्सर यह बिमारी पाई गई है।
  • कुछ दवायें जैसे: demeclocycline (Declomycin), ofloxacin(Floxin), orlistat (alli, Xenical), को लेने से भी इस बीमारी के विकसित होने का खतरा होता है।
  • अगर आपके रक्त मेँ कैल्शियम की बहुत ज्यादा मात्रा है (hypercalcemia)
  • अगर आपके रक्त मेँ पोटेशियम की मात्रा बहुत कम है (hypokalemia)
  • अगर आपको किडनी से संबंधित बिमारी है जैसे – Polycystic kidney disease

सेंट्रल डायबिटीज इन्सिपिडस, डायबिटीज इन्सिपिडस का ही एक अन्य रूप है। सेंट्रल डायबिटीज इन्सिपिडस में किडनी तो सही तरह से काम करता है लेकिन इस रोग से पीड़ित रोगी के दिमाग में ADH सही मात्रा में नहीं बनता है। सेंट्रल डायबिटीज इन्सिपिडस के लक्षण, डायबिटीज इन्सिपिडस जैसे ही होते हैं और ADH की जगह, डेस्मोप्रेसिन नामक दवा के द्वारा, इनका इलाज भी संभव है।

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस का उपचार

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस, का उपचार करना मुश्किल होता है। इसमें आपकी किडनी, ADH के लिए कोई प्रतिक्रिया नहीं देती है इसलिए अगर और ADH दिया गया तो भी इससे आपकी बीमारी के इलाज का कोई उपाय नहीं मिलेगा। ऐसे में और ADH देना आपके इलाज के लिए अच्छा तरीका नहीं है। वास्तव में, इस बीमारी के इलाज के विकल्प बहुत ही सीमित हैं।

यदि आप लिथियम का उपयोग कर रहे हैं तो इस दवा को छोड़ने के बाद हो सकता है कि आपकी बीमारी खुदबखुद ठीक हो जाएँ।

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस से पीड़ित लोगों के उपचार का सबसे अच्छा तरीका होगा कि वह खूब पानी पिए जिससे उनके शरीर में पानी की कमी ना हो। लेकिन हो सकता है कि उन्हें बार- बार यूरिन पास करना पड़े। हालांकि, कुछ लोगों को लगातार प्यास और पेशाब बर्दास्त करना, असहनीय हो सकता है।

नीचे कुछ इलाज के तरीके बताये गए है, जिनके द्वारा इस बीमारी के लक्षणों को कम किया जा सकता है:

  • अपने आहार में बदलाव: कम नमक और कम प्रोटीन वाले आहार के सेवन से, मूत्र उत्पादन कम होता है। इसलिए अपने आहार में इन चीजो को शामिल करें।
  • नोनस्टेरॉइड एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs): Ibuprofen(Motrin), Indomethacin (Indocin), and Naproxen (Naprosyn), यह सभी दवाएं, मूत्र उत्पादन को कम करते हैं।
  • डाईउरेटिक Diuretics: यह विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन “वॉटर पिल्स” जैसे : Hydrochlorothiazide aur Amiloride, को नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस से पीड़ित लोगों के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह सभी दवायें, मूत्र उत्पादन को कम करते हैं।

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस से पीड़ित वयष्क और बच्चों दोनों को, बार- बार बाथरूम का इस्तेमाल करना पड़ता है। बार- बार यूरिन पास करने से आप मूत्राशय में फैलाव जैसी समस्या से बच सकते हैं और भविष्य मेँ, लंबे समय तक उत्पन्न होने वाली समस्या से भी छुटकारा पा सकते हैं।

नेफ्रोजेनिक डायबिटीज इन्सिपिडस से पीड़ित लोगों के लिए सबसे अच्छा उपचार खूब पानी पीना है। इससे आपके शरीर मेँ पानी की कमी और इलेक्ट्रोलाइट इमबैलेंस जैसी समस्यायें नहीँ होंगी क्योंकि यह भविष्य मेँ, बड़ी समस्याओं को भी जन्म दे सकता है। शरीर में पानी की कमी पूरी होने पर, ताजे फलों के सेवन और मल्टीविटामिन लेने के बाद भी, यदि आपके लक्षणोँ मेँ कोई सुधार नहीँ होता है, तो आपको चिकित्सीय सहायता लेने की आवश्यकता पड़ सकती है।



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