नवजात शिशु और रंग दृष्टिहीनता

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23rd March, 2018

Navjat shishuo me drishtiheenta | नवजात शिशुओं में दृष्टिहीनता | Color blind babies

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रंग दृष्टिहीनता एक ऐसी समस्या होती है, जिसमें व्यक्ति रंगों में भेद नहीं कर पाता। यह समस्या दो तरह की होती है: एक तो वह जिसमें रोगी बिलकुल भी रंगों में फर्क नहीं कर पाता और उसे चीजें, सिर्फ काले और सफ़ेद रंग की ही दिखाई देती है और दूसरी वह जिसमें उसे रंग हलके दिखाई देते हैं और वह रंगों के बीच भेद नहीं कर पाता।

वहीँ कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो किसी रंग को पहचान सकते हैं और अंतर कर सकते हैं लेकिन बाकी रंगों की पहचान नहीं कर पाते। वहीं दूसरी और रंगों के भी बहुत से शेड होते हैं, कुछ हलके तो कुछ गहरे। ऐसे में उनके लिए गहरे रंगों की पहचान हलके रंगों के मुकाबले करना थोड़ा आसान होता है, यदि वह रंगों को थोड़ा-बहुत देख पाते हैं, तो।

यदि इस समस्या जिसे अंग्रेजी में कलर ब्लाइंडनैस कहा जाता है, बच्चों को से संबंधित इसकी बात की जाए तो नवजात शिशुओं में इसकी पहचान बेहद मुश्किल होती है। किसी बच्चे को कलर ब्लाइंडनैस है या नहीं, इसकी पहचान तभी की जा सकती है, जब वह चार से ऊपर हो चुका हो। हालाँकि यह भी आवश्यक नहीं है कि इतनी उम्र में भी इसका पता लग ही जाए क्योंकि हर एक बच्चे की सिखने के क्षमता भी अलग होती है। कुछ बच्चे रंगों में भेद करना जल्दी सीख सकते हैं और कुछ को थोड़ा समय लग सकता है।

वहीँ जिन माता-पिता में यह समस्या होती है, यदि उनका बच्चा चार से पाँच साल का हो चुका है और माता-पिता को महसूस हो रहा है कि बच्चा रंगों की पहचान नहीं कर पा रहा है तो बच्चे के कलर ब्लाइंडनैस होने की आशंका और भी अधिक बढ़ जाती है। क्योंकि यह समस्या अनुवांशिक तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी भी जा सकता है। वहीँ इस समस्या के होने की आशंका लड़कियों के मुकाबले लड़कों में अधिक होती है।

बच्चों में कलर ब्लाइंडनैस की जाँच  

इस समस्या की जाँच, डॉक्टर एक विशेष प्रकार की प्लेट के द्वारा करते हैं। जिस पर रंग से कोई पैटर्न बनाया जाता है। उदाहरण के तौर पर एक लाल रंग की तख्ती हरे रंग से 2 लिख दिया जाए और इसे कलर ब्लाइंड बच्चे को दिखाया जाए और यदि उसे हरा रंग न दिखाई देता हो तो वह हरे रंग से लिखे 2 को नहीं देख पाएगा। ऐसे ही अलग-अलग रंगों की प्लेट्स से बच्चों में कलर ब्लाइंड होने या न होने की पहचान की जाती है।

जाँच का यही तरीका बड़ों में भी अपनाया जाता है। हालाँकि, बच्चों में यह जाँच तभी हो सकती है, जब बच्चा लिखना-पढ़ना सीख रहा हो यानी थोड़ा बड़ा हो गया हो।

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