कई प्रकार का होता है मोतियाबिंद

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15th March, 2018

मोतियाबिंद में व्यक्ति की आँख के लेंस पर धुंधली परत जम जाती है और व्यक्ति को धुंधला दिखाई देने लगता है। मोतियाबिंद 40 की उम्र पार कर चुके लोगों में कभी भी पनप सकता है और यह एक ऐसी समस्या है, जो दुनियाभर में अंधेपन का सबसे आम कारण है। हालाँकि मोतिया को लोग सिर्फ एक ही नाम से जानते हैं लेकिन हममे से ज्यादातर लोगों को नहीं पता होगा कि मोतिया भी अलग-अलग प्रकारों का होता है और इनके प्रकारों के आधार पर इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

मोतिया के प्रकार-

न्यूक्लियर कैटरेक्ट (Nuclear Cataracts)- यह मोतिया लेंस के बीच वाले हिस्से को प्रभावित करता है। शुरुआत में पास की चीजें तो साफ़ दिखाई देती हैं, लेकिन धीरे-धीरे लेंस गधे पीले रंग का होता चला जाता है और दृष्टि धुंधली पड़ने लगती है। धीरे-धीरे लेंस का रंग भूरे रंग में भी बदल सकता है। इन दोनों ही प्रकार के धब्बों के कारण व्यक्ति गाढ़े और हल्के रंगो में भेद नहीं कर पाता।

कॉर्टिकल मोतियाबिंद (Cortical Cataracts)- जो मोतिया लेंस के किनारों को प्रभावित करता है उसे, कॉर्टिकल मोतियाबिंद (Cortical Cataracts) नाम से जाना जाता है। यह लेंस के किनार पर सफ़ेद रंग की गोल सी धारी के रूप में नज़र आता है। जैसे-जैसे मोतिया पुराना होता जाता है, यह धारी मोटाई में लेंस के बीच की तरफ भी बढ़ती रहती है।

उपसंकल मोतियाबिंद (posterior subcapsular cataracts)- जो मोतिया लेंस के पिछले हिस्से को प्रभावित करता है उसे पीछे का उपसंकल मोतियाबिंद (posterior subcapsular cataracts) कहा जाता है। इसकी शुरुआत लेंस के पिछले हिस्से में, एक छोटे से अपारदर्शी धब्बे के रूप में होती है। इस प्रकार के मोतियाबिंद के रोगियों को पढ़ने में ज्यादा दिक्कत आती है। साथ ही ज्यादा रौशनी में भी व्यक्ति को कम दिखाई देने लगता है। बल्ब या प्रकाश के चारो तरफ घेरा सा बना हुआ दिखाई देता है। यह मोतिया अन्य के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ता है।

जन्मजात मोतियाबिंद (Congenital Cataracts)- जो मोतिया जन्म के समय से ही किसी बच्चे में मौजूद होता है उसे जन्मजात मोतियाबिंद (Congenital Cataracts) कहा जाता है। यह मोतिया जन्म से पहले संपूर्ण पोषण की कमी या फिर आनुवंशिक कारणों से भी हो सकता है। या फिर गर्भ में किसी प्रकार की चोट लगने के कारण भी यह मोतिया पनप सकता है।

 

इनके अलावा, मायोटोनिक डिस्ट्रोफी, गैलेक्टोस मिया, न्यूरोफिब्रोमैटिस टाइप 2 या रूबेला ऐसी अन्य स्थितियां हैं, जिनके कारण जन्म के समय से ही या बचपन में ही किसी बच्चे में मोतिया की शुरुआत हो जाती है।

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