सिस्टोलिक हृदय विफलता

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19th August, 2015

Untitled design (48)किसी व्यक्ति में सिस्टोलिक हृदय विफलता जैसी स्थिति तब  उत्पन्न होती है जब उसका हृदय का बांया हिस्सा रक्त को पम्पिंग द्वारा सामान्य रूप से शरीर में नहीं भेज पाता।

हृदय पर प्रभाव
सिस्टोलिक हृदय घात में सीधे तौर पर हृदय का बांया हिस्सा प्रभावित होता है। हृदय का यही हिस्सा शरीर में रक्त पहुंचाने का काम करता है। हृदय के इसी बाएं हिस्से को बांया वेंट्रिकल कहते हैं। इसे सिस्टोलिक नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि इसमें वेंट्रिकल दबाव डालकर सिस्टोल को नहीं निचोड़ पाता। यह प्रकिया हृदय की धड़कन का ही एक हिस्सा होती है।

जांच के दौरान जब इंजेक्शन फ्रैक्शन का स्तर नीचे नजर आता है, तो इसका मतलब होता है कि हृदय का बांया वेंट्रिकल सामान्य तौर पर काम नहीं कर रहा है। डॉक्टर कभी-कभी इसे कम इंजेक्शन फ्रैक्शन का नाम भी देते हैं।

इजेक्शन फ्रैक्शन हृदय को नापने का एक ऐसा पैमाना होता है, जिसमें हृदय और उसके बाएं वेंट्रिकल की क्षमता का पता चलता है। इससे पता चलता है कि बांया वेंट्रिकल कितनी क्षमता से रक्त की शरीर में पम्पिंग कर रहा है।

बांया वेंट्रिकल रक्त का सिर्फ वही अंश आगे पहुंचाता है, जो उसके पास होता है। इजेक्शन फ्रैक्शन पम्प हो चुके रक्त की वह मात्रा है, जो बाएं वेंट्रिकल में होती है। एक सामान्य इजेक्शन फ्रैक्शन की मात्रा रक्त की मात्रा की 55% से अधिक होती है। यदि हृदय का आकार बढ़ जाए, तो भी बाएं वेंट्रिकल द्वारा पम्प किये गए रक्त की मात्रा उतनी ही होती है, लेकिन फेंके गए रक्त का फ्रेक्शन कम हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर:
100 ml की मात्रा वाला एक स्वस्थ हृदय 60 ml रक्त महा धमनी में पंप करता है, तो इसका इजेक्शन फ्रैक्शन 60% होता है।
एक हृदय जिसका बांया वेंट्रिकल बढ़ गया हो उसमें रक्त की मात्रा 140 ml होती है, लेकिन यह भी महाधमनी में 60% रक्त की मात्रा ही भेजता है लेकिन इसका इजेक्शन फरैक्शन 43% होता है।

सिस्टोलिक हृदय के कारण
ऐसी कई समस्याएं हैं जिनके कारण सिस्टोलिक हृदय विफलता की समस्याएँ आ सकती है।

कारण क्यों होता ऐसा कैसे ये कारण बन जाते हैं हृदय विफलता
धमनी की बीमारी (कोरोनरी) या दिल का दौरा कोरोनरी धमनियों में ब्लोकेज हृदय की मांशपेशियों में रक्त के प्रवाह को बंद कर देती है। इस से हृदय की मांशपेशियां कमजोर या ध्वस्त हो जाती हैं और मांशपेशियों की रक्त पम्प करने की क्षमता कम हो जाती है।
कार्डियोमायोपैथी
हृदय मांसपेशियों की बीमारी
हृदय की मांश पेशियों के कमजोर हो जाने से उनमें रक्त को पम्प करने की क्षमता नहीं रहती।
उच्च रक्तचाप धमनियों में बढ़ा हुआ दबाव उच्च रक्तचाप के कारण हृदय को पम्प करने के लिए ज्यादा कार्य करना पड़ता है और इसके कारण मांशपेशियां कमजोर हो जाती हैं।
महाधमनी संकुचन महाधमनी वाल्व का खुलना सिकुड़ जाता है और इस के कारण रक्त प्रवाह में कठिनाई होती है। हृदय को कमजोर मांशपेशियों और संकुचित वाल्व में से रक्त को पम्प करने में अधिक कार्य करना पड़ता है।
माइट्रल

प्रत्यावहन
माइट्रल वाल्व पूरी तरह से बंद नहीं हो पाता, जिससे हृदय के बाएं हिस्से में रक्त लीक होना शुरू हो जाता है। बढ़ी हुई रक्त की मात्रा और कमजोर मांशपेशियां
वायरल मायोकार्डिटिस हृदय मांशपेशियों में वायरल संक्रमण हृदय की मांसपेशियों में सूजन हृदय के कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करती है।
अतालता हृदय की अनियमित धड़कन हृदय की असामान्य धड़कन हृदय की हृदय द्वारा असामान्य पंपिंग को प्रभावित करती है।

क्रमिक हृदय क्षति

धमनी की कोरोनरी बीमारी लगातार हृदय को नुकसान पहुंचाती रहती है। जब हृदय की मांशपेशियों को उचित मात्रा में रक्त नहीं मिल पाता तो इस स्थिति को मेडिकल की भाषा में इस्केमिया कहा जाता है। इस्केमिया की स्थिति केवल कुछ ही बार पैदा होती है। यह व्यायाम करते समय, जब हृदय को और अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है, ऐसी स्थिति में पैदा होती है। यदि इस्केमिया की स्थिति लगातार बनी रहे और कोरोनरी धमनियां भी हृदय में रक्त प्रवाह करने में कमजोर हों तो यह इस्केमिया क्रोनिक में भी बदल सकती है। वहीं ऑक्सीजन के अभाव में क्रोनिक हृदय मांशपेशियों को ध्वस्त कर सकता है। वहीं हृदय भी इसमें धीरे-धीरे रक्त को आगे भेजने की क्षमता को खो सकता है। क्रोनिक इस्केमिया के चलते हृदय की मांशपेशियाँ तो जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन ग्रहण कर सकती हैं, लेकिन उन्हें इतनी भी ऑक्सीजन नहीं मिलती कि वह सामान्य तौर पर अपना काम सुचारू रूप से कर सकें। वहीं रक्त प्रवाह में निरंतर बढ़ती परेशानी से हृदय की मांशपेशियां भी हृदय की धड़कन के साथ रक्त के प्रवाह को कम कर सकती हैं। यदि हृदय में रक्त कम पहुंचेगा तो इस से शरीर में रक्त की पम्पिंग भी कम होगी। जिसके कारण कोरोनरी धमनियों में भी रक्त कम पहुंचेगा। जिसका अंतिम नतीजा यह होगा कि हृदय विफलता से इस्केमिया की स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी। जिस से घातक हृदय विफलता जैसे नतीजे सामने आएँगे।

माइट्रल वाल्व प्रत्यावहन:
माइट्रल वाल्व प्रत्यावहन भी धीरे-धीरे सिस्टोलिक हृदय घात को न्यौता देता है। इस समस्या में माइट्रल वाल्व पूरी तरह से बंद नहीं हो पाती और रक्त वापिस बाएं वेंट्रिकल में उस वक्त लीक होता है, जब वह सिकुड़ी हुई होती है। धीरे-धीरे बांयें वेंट्रिकल के लिए अतिरिक्त रक्त जो उसके पास वापस लौटा था, उसको आगे पम्प करना मुश्किल हो जाता है। इसके कारण वेंट्रिकल में खिंचाव आ जाता है और यह ज्यादा रक्त इकठ्ठा होने के कारण चौड़ा हो जाता है। बाएं वेंट्रिकल का धीरे-धीरे कमजोर होते जाना एक दिन हृदय विफलता का कारण बन जाता है।

उच्च रक्तचाप भी हृदय विफलता का कारण बन सकता है। रक्तचाप के कारण हृदय को दायें वेंट्रिकल में पम्पिंग के दौरान ज्यादा दबाव झेलना पड़ता है। उच्च रक्तचाप के ज्यादा समय तक रहने से बांया वेंट्रिकल कमजोर होने लगता है। इस कमजोरी के कारण हृदय की मांशपेशियां खिंच कर फ़ैल जाती हैं। इस प्रक्रिया को खतरनाक फैलाव कहा जाता है। यह फैलाव हृदय को कमजोर बनाता है और जिसके कारण वह सामान्य पम्पिंग के लिए समर्थ नहीं रहता और इसका नतीजा सिस्टोलिक हृदय विफलता के रूप में सामने आता है।

अचानक से पहुंची हृदय को क्षति
अचानक से आए हृदय विफलता से हृदय की मांशपेशियां नष्ट हो जाती हैं। हृदय विफलता के कारण अचानक से हृदय में रक्त का संचार रुक जाता है। जिस से कि हृदय की मांशपेशियां ऑक्सीजन नहीं ले पाती। यदि हृदय की मांशपेशियां ज्यादा समय तक बिना ऑक्सीजन के रहे तो वे मर सकती हैं। यदि हृदय विफलता की वजह से मांशपेशियों का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाए तो इसकी वजह से हृदय गति अचानक से धीमी हो जाएगी। जिसके कारण सिस्टोलिक हृदय विफलता जैसी परेशानी सामने आ जाएगी। यह अचानक से होने वाली जटिलता सामान्य नहीं है।

यदि किसी को हृदय विफलता की समस्या है और उसकी हृदय की मांशपेशियों का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो चुका है तो उस व्यक्ति को भले अंतिम तौर पर हृदय विफलता होता ही है, भले ही वह अचानक से न हो। यदि हृदय की भीतरी दीवारों का हिस्सा नष्ट हो जाए तो इस से हृदय की हर एक धड़कन द्वारा फेंके गए रक्त की गति भी धीमी हो जाती है, जिसका नतीजा यह होता है कि हृदय पम्पिंग बढ़ाने के लिए अपना आकर बदलना शुरू कर देता है। इस प्रकिया का नतीजा बाएं वेंट्रिकल के फिर से बनने (रिमॉडलिंग) के रूप में सामने आता है। शुरुआत में तो यह बदलाव जो हृदय की भीतरी दीवार (मायोकार्डियम) पर आता है फयदेमदं होता है। लेकिन धीरे-धीरे बांया वेंट्रिकल भी फैलने लगता है और इसका सीधा असर हृदय की पम्पिंग पर पड़ता है।

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