कैसे की जाती है जुड़वाँ गर्भावस्था की जाँच?

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24th June, 2016

Judvan garbhavastha ke bare mein kaise pata karein? | जुड़वाँ गर्भावस्था के बारे में कैसे पता करें? | How to know about Twin Pregnancy?जुड़वाँ गर्भावस्था उस स्थिति को कहा जाता है, जिसमें किसी महिला के गर्भ में एक से अधिक शिशु पल रहे हों। लक्षणों के आधार पर, जुड़वाँ गर्भावस्था का पता नहीं चल पाता, इसकी जानकारी गर्भधारण के बाद की जाने वाली जाँच (अल्ट्रासाउंड) के दौरान मिलती है। यदि किसी महिला के गर्भ में एक से अधिक भ्रूण है, तो भ्रूण के विकास और एमनियोटिक द्रव (गर्भ में भरे पानी और रक्त से भरी थैली) पर लगातार नजर रखी जाती है। नियमित तौर पर महिला का अल्ट्रासाउंड कर, गर्भ में पल रहे बच्चों और महिला की स्थिति की जाँच की जाती है।

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यदि एक बार जाँच में, जुड़वाँ गर्भावस्था सामने आती है, तो प्रसव के ठीक पहले तक निम्न जांचें की जाती हैं-

  • उच्च रक्त चाप की जाँच- गर्भावस्था के दौरान, महिलाओं का बल्ड प्रैशर आम तौर पर बढ़ ही जाता है और महिला जितनी बार भी डॉक्टर के पास जाती हैं, ब्लड प्रैशर की जाँच की जाती है।  ब्लड प्रैशर के साथ-साथ गर्भावस्था के दौरान, प्रीक्लैम्पसिया की जाँच भी की जाती है।
  • रक्त परीक्षण- रक्त परीक्षण, शरीर में आयरन की कमी (एनीमिया) की जाँच के लिए किया जाता है। गर्भावस्था के दौरान, एनीमिया होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है, ख़ास तौर पर यदि महिला को जुड़वाँ गर्भावस्था हो तो।
  • यूरिन टेस्ट- गर्भावस्था के दौरान, मूत्र परीक्षण एक आम बात है, क्योंकि इसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि कहीं यूटीआई संक्रमण तो नहीं है।
  • ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड– इसके जरिए गर्भाशय ग्रीवा की लंबाई की जांच की जाती है। क्योंकि यदि गर्भाशय ग्रीवा छोटी रहती है, तो ऐसे में अपरिपक्व प्रसव का खतरा भी रहता है।
  • गर्भावधि मधुमेह – गर्भावस्था के दूसरे या तीसरे महीने में, गर्भावधि मधुमेह की जांच की जाती है ताकि मौखिक शर्करा का पता लगाया जा सके।
  • इलेक्ट्रॉनिक फेटल हार्ट मॉनिटरिंग- यह जाँच प्रसव के पहले या प्रसव के दौरान, इस्तेमाल की जाती है ताकि यह देखा जाए की भ्रूण स्वस्थ और सही स्थिति में है या नहीं।

जन्म दोष के लिए की जाने वाली जाँच-

जुड़वाँ गर्भावस्था में आनुवंशिक विकार और जन्म दोष का खतरा अधिक रहता है। ऐसे में, जन्म दोष का परीक्षण दो प्रकार से किया जाता है-

  • स्क्रीनिंग टेस्ट- स्क्रीनिंग टेस्ट के जरिये, बच्चों में एक निश्चित जन्म दोष की जाँच की जाती है। हालाँकि यह जरूरी नहीं है कि यह जरूरी नहीं है कि जाँच के दौरान, सामने आई जन्मदोष की रिपोर्ट सही हो और एक बार हुई जाँच की रिपोर्ट के बाद कुछ अन्य स्क्रीनिंग टेस्ट भी किये जाते हैं, ताकि जाँच की पुष्टि की जा सके। यह जाँच तब ज्यादा जरूरी होती है, जब महिला को जुड़वाँ गर्भावस्था होती है।
  • कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (सीवीएस )- इस परीक्षण के द्वारा, प्लेसेंटा के छोटे टुकड़ों का प्रयोग किया जाता है। इसमें योनि द्वार से एक पतली ट्यूब के द्वारा इन टुकड़ों को गर्भाशय तक पहुंचाया जाता है। यह पेट से गर्भाशय में सुई पहुंचाकर भी किया जा सकता है। यह जाँच गर्भावस्था के 10 से 12 वें हफ्ते के बीच की जाती है।
  • एम्निओसेंटेसिस(Amniocentesis)- इस जाँच में, थोड़ी सी मात्रा में, एमनियोटिक द्रव को गर्भाशय में सुईं के माध्यम से पहुँचाया जाता है। यह परीक्षण गर्भावस्था के 15 से 20 वें हफ्ते के बीच किया जाता है।

यह सभी जांचें महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की सुरक्षा और स्वसःत्य को ध्यान में रख कर की जाती हैं।

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